Raksha bandhan manane ki kathaye | रक्षाबंधन मनाने की कथाएं | Story of Raksha Bandhan celebration

भारत में कई प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं. यहां दिवाली, दशहरा, होली, रक्षाबंधन, भाई दूज और भी कई प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं. इसी कारण भारत को त्योहारों का देश भी कहा जाता है. रक्षाबंधन का पर्व प्राचीन काल से मनाया जा रहा है. यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. यह भाई-बहन के अटूट प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. आखिर रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है? ऐसा क्या हुआ कि बहने अपने भाई की मंगल कामना के लिए श्रावण मास की पूर्णिमा कौ भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं? हमारे मन में हमेशा से यह जिज्ञासा रहती है कि पौराणिक, ऐतिहासिक समय में ऐसा क्या हुआ था कि इस त्यौहार का प्रचलन बढ़ता ही गया. इस जिज्ञासा के तहत कुछ कथाएं प्रचलित है जो हमें बताती है कि रक्षाबंधन के दिन अपने भाइयों को राखी जरूर बांधनी चाहिए. उनकी कलाई सुनी नहीं रखनी चाहिए.

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रक्षाबंधन मनाने की कथाएं
रक्षाबंधन मनाने की कथाएं

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रक्षाबंधन मनाने के पीछे की कहानी


कृष्ण और द्रौपदी की कहानी 


महाभारत काल में जब श्री कृष्ण युद्ध करते समय शिशुपाल का वध कर रहे थे तब कृष्ण की तर्जनी उंगली में चोट लग गई और उनके उंगली से खून बहने लगा. इसी रक्त को रोकने के लिए द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण की ऊँगली बांधी. जिस दिन यह घटना हुई उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी. इसी राखी का ऋण चुकाने के लिए जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तब श्री कृष्ण ने उस की लाज बचाई थी.

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राजा बलि और माँ लक्ष्मी की कहानी


विष्णु पुराण की कथा के अनुसार एक बार दानवों  के राजा बलि ने 100 यज्ञ पूरे कर लिए थे और उसके बाद वह चाहता था कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो. राजा बलि की इच्छा की भनक देवराज इंद्र को हो गई. वह बुरी तरह से डरकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वह इस संकट से उसे निकालें. भगवान विष्णु ने इंद्र की बात मानी और वामन अवतार लेकर राजा बलि के दरवाजे पर भिक्षा मांगने गए. राजा बलि ने उनसे कहा कि आपको जो चाहिए वह मांगिए, मैं आपको दूंगा. ब्राह्मण वैश्य विष्णु जी ने राजा बलि से तीन पग भूमि की मांग की. राजा बलि ने कहा कि आप जहां भी अपने तीन पग रखेंगे वह सब आपका होगा. यह राजा बली का वचन है. तो विष्णु जी ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में धरती को नाप लिया. बलि को यह देख चिंता हो गई कि दो पग में ही तो सारा कुछ चला गया. तीसरा पग कहां रखेंगे और अगर यह पुरा ना हुआ तो वह अपना वचन नहीं निभा पाएगा. तो उसने अपना सर भगवान विष्णु के आगे कर दिया और कहा कि आप मेरे सिर पर अपना तीसरा पद रख दीजिए. भगवान विष्णु का तीसरा पांव रखते ही राजा बलि परलोक चला गया. विष्णु जी राजा बलि के वचन पालन की दृढ़ता को देख कर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे कुछ वरदान मांगने को कहा. राजा बलि ने कहा कि मुझे वरदान में आप चाहिए. आप दिन रात मेरे सामने रहेंगे. इस कारण विष्णु जी को राजा बलि का द्वारपाल बनना पड़ा. इस वचन को लेकर लक्ष्मी जी बहुत चिंतित हो गईं. अपनी चिंता को दूर करने के लिए लक्ष्मी जी ने नारद जी से पूछा तो नारद जी ने कहा आप राजा बलि को राखी बांधकर उसे अपना भाई बना लीजिये और उपहार के रूप में विष्णु जी की वचन से मुक्ति मांग लीजिये. लक्ष्मी जी ने ऐसा ही किया और राजा बलि ने लक्ष्मी जी को अपनी बहन मानकर भगवान विष्णु को आजाद कर दिया. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी. इसीलिए इस दिन राखी का त्यौहार मनाते हैं.

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यम और यमुना की कहानी 


इस कथा के अनुसार मृत्यु के देवता यमराज जब अपनी बहन यमुना से मिलने 12 वर्षों तक नहीं गए तो यमुना दुखी हो गई और माँ गंगा से इस बारे में बात की. माँ गंगा ने यमराज को यह संदेश पहुंचाया कि उसकी बहन यमुना उसकी प्रतीक्षा कर रही है. इस बात को सुनते ही यमराज फौरन यमुना के पास पहुंच गया. बहन यमुना ने अपने भाई को अनेक प्रकार के पकवान बनाकर उसे खिलाया. इस पर यमराज प्रसन्न हो गए और यमुना को वरदान मांगने को कहा. यमुना ने वरदान मांगा कि कोई बहन अपने भाई से ज्यादा दिन दूर ना रहे. यमराज ने अपनी बहन की इच्छा पूरी की. जिस दिन यह वरदान दिया उस दिन श्रावण महीने की पूर्णिमा थी. इसीलिए इस कथा के द्वारा भी रक्षाबंधन को याद किया जाता है.

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रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी 


ऐतिहासिक कथा के अनुसार जब राजपूतों और मुगलों में लड़ाई हो रही थी तब चित्तौड़ के महाराज की विधवा महारानी कर्णावती ने अपने राज्य की रक्षा के लिए हिमायू से मदद मांगी. हुमायूं राजपूतों का दुश्मन था. उसे रानी कर्णावती ने मदद करने और अपनी रक्षा करने के लिए उपहार के रूप में राखी भेजी थी. हुमायूं ने उस राखी की लाज रखी और रानी कर्णावती की रक्षा करते हुए अपनी सेना वापस बुला ली थी. इस ऐतिहासिक घटना को भी भाई-बहन के अटूट प्यार के रूम में जाना जाता है.

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सिकंदर और राजा पुरु की कहानी


326 ईसवी पूर्व जब सिकंदर ने भारत में प्रवेश किया तो सिकंदर की पत्नी रोसानक ने राजा पुरु को एक राखी भेजी और अपने पति सिकंदर पर जानलेवा हमला न करने का वचन लिया. इस परंपरा के अनुसार जब युद्ध भूमि में राजा पुरु और सिकंदर के बीच युद्ध हो रहा था उसी समय राजा पुर को अपनी कलाई पर वही राखी दिखी. उन्हें अपना वचन याद आ गया और राजा पुर ने सिकंदर पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया. यह कहानी भी राखी के त्योहार के रूप में याद किया जाता है.


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